Thursday, 21 September 2017

सांस्कृतिक चेतना की हुंकार - थिएटर ऑफ रेलेवंस के कलात्मक सृजना के 25 साल का नाट्य उत्सव !!!

सांस्कृतिक चेतना की हुंकार - थिएटर ऑफ रेलेवंस के कलात्मक सृजना के  25 साल का नाट्य उत्सव !!!


          नई दिल्ली , भारत की राजधानी.. जहां होते हैं देश के भविष्य के विचार , जहां लिए जाते हैं निर्णय , जो कही जाती है राजनीति की नींव , जहां जुड़ते हैं देश के विकसित भविष्य निर्माण के धागे । कुरुक्षेत्र नामक इस राजनैतिक भूमि पर अपनी सात्विकता को प्रस्थापित करने के लिए थिएटर ऑफ रेलेवंस के प्रतिबद्ध रंगसाधकों ने दी हुंकार " सांस्कृतिक चेतना " की ।

          थिएटर ऑफ रेलेवंस नाट्य दर्शन कला से ' आत्म साक्षात्कार ' के लिए व्यक्ति को उत्प्रेरित और उन्मुक्त करता है । समाज के नक़ाब उतारकर सच्चाई बताता है और आत्म संघर्ष के लिए प्रेरित होकर इंसान में वैचारिक तथा तात्विक परिवर्तन लाता है ताकि इंसान में इंसानियत जगी रहे , ऐसी सृजनात्मक , रचनात्मक एवं उन्मुक्तता के 25 साल का उत्सव !! वाह , एक चौथाई सदी से चल रहे  इस रंग आंदोलन के संघर्ष , सृजन यात्रा और साध्य से देश की राजधानी को अपनी विविध रंगों से ' रंग उत्सव ' में सराबोर करने से बड़ा सपना और क्या हो सकता है !



          इस सपने को साकार किया है विश्वविख्यात रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज (जो स्वयं इस नाटय दर्शन के जनक है) और थिएटर ऑफ रेलेवंस के अभ्यासक और कला साधक  - बबली रावत , अश्विनी नांदेड़कर , योगिनी चौक , सायली पावसकर , तुषार म्हस्के , कोमल खामकर और संकेत आवळे ने । इन कलाकारों ने अपने आप को थिएटर ऑफ रेलेवंस की कलात्मक प्रक्रियाओं में खंगोला , साधा और तथाकथित नाटकों , लेखकों , निर्देशकों , कलाकारों एवं नाट्य अवधारणाओं के परखच्चे उड़ा दिए । कला और कलाकारों को बाजार के षड़यंत्र ( केवल मनोरंजन तक सीमित रहना ) से उन्मुक्त किया है और " थिएटर ऑफ रेलेवंस के अंतर्गत नाटकों का लक्ष्य सांस्कृतिक चेतना लाना है और इस लक्ष्य के लिए हम प्रतिबद्ध हैं" यह विश्वास दर्शकों में निर्माण किया है !

          12 अगस्त 1992 में , थिएटर ऑफ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत का जन्म हुआ और 10 ,11 ,12 अगस्त 2017 को इस तत्व के 25 साल का जन्मदिन नई दिल्ली में मनाया गया । इसमें लगातार , मंजुल भारद्वाज लिखित एवं निर्देशित ३ विशेष कलात्मक ( Classic and Artistic ) नाटकों की प्रस्तुति हुई - पहले दिन ' गर्भ ' - जो मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने का संघर्ष है , दूसरे दिन ' अनहद नाद - Unheard Sounds of Universe ' - जो कलात्मक मंथन प्रक्रिया से कला और कलाकार को उत्पादिकरण से उन्मुक्त करता है और तीसरे दिन ' न्याय के भंवर में भंवरी ' - शोषण और दमनकारी पितृसत्ता के खिलाफ न्याय , समता और समानता की हुंकार है ।




          सरकारी अनुदान और राज आश्रित की ' जड़ और गतिहीन ' रंगभूमि पर ' थिएटर ऑफ रेलेवंस ' के कलाकारों ने अपने कलात्मक सात्विक पहचान के साथ थिएटर ऑफ रेलेवंस की ' प्रयोगशील, जन सरोकारी और कलात्मक ' रंगभूमि को " राजधानी " में स्थापित किया है । और यही थिएटर ऑफ रेलेवंस कलासाधकों का साध्य है । थिएटर ऑफ रेलवंस ने अपने नाट्य प्रस्तुतियों से सतत जनता को नई कलात्मक दृष्टि प्रदान की है । इस दृष्टि को साधने के लिए सर्वप्रथम कलाकारों ने अपने आप को चिंतन , मनन , मंथन , व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रियाओं में खंगोला । इन प्रक्रियाओं से निर्मित सोच को फैलाने के लिए हर पल को चैतन्य अवस्था में जीया , हर दिन चैतन्य अभ्यास किया , अपनी आवाज़ , शरीर , विचार को परफार्मिंग स्तर पर तैयार किया और उससे अर्जित ज्ञान को अपने जीवन में आत्मसाथ किया । 

          थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन का उद्देश्य है नक़ाब उतारना और वास्तविकता से परिचित कराना... और कला मनुष्य को मनुष्य बनाये रखने का एकमात्र जरिया है । थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के नाट्य सिद्धांत ने कला की प्रस्थापित अवधारणाओं को तोड़ कर अपनी नयी पहचान स्थापित की है , और यह पहचान एक रंग आंदोलन का रूप लेकर 12 अगस्त 1992 से  अब तक गली , गावों , शहरों , देश - विदेशों में अपना अस्तित्व कायम करती आगे बढ़ रही है । नाटक या रंगकर्म यह केवल रंजन का माध्यम नहीं है बल्कि अपनी सशक्त एवं बौद्धिक अभिव्यक्ति से दर्शकों के मस्तिष्क में हो रही मंथन प्रक्रिया को उत्प्रेरित कर , उन्हें अपने साथ रचनात्मक बदलाव के लिए जोड़ना और तैयार करना है । 

" थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य उत्सव 2017" - 10 अगस्त , मुक्तधारा ऑडिटोरियम , नई दिल्ली 

नाटक - " गर्भ "



           नाटक " गर्भ " यह एक संघर्ष है - अपने अस्तित्व के निर्माण का , मनुष्य का मनुष्य बने रहने का , मानवता को बचाये रखने का , अपने समाज के बने बनाये विचारधारणाओं को तोड़ कर स्वयं को देखने का और दुनिया / विश्व को खूबसूरत बनाये रखने का । यह नाटक एक सकारात्मक नजरिया निर्माण करता है , सदियों से चली आ रहीं परम्पराओं , रूढ़िवादी संस्कार , समझ , वैचारिक जकड़न जो जन्म के संयोग पर हमारे साथ जन्म लेती हैं और चाहे मानव कितनी भी कोशिश करे यह साथ नहीं छोड़ती , इन्हीं जड़ताओं को तोड़ कर अपने को उन्मुक्त करता है " गर्भ " । नाटक का आरम्भ ब्रम्हांड से होता है...  ब्रह्माण्ड यह लौकिकता से सम्पन्न है और पृथ्वी की सृजना इसी लौकिकता से निर्मित प्राकृतिक तत्वों से हुई है । पानी , हवा , मिटटी , अग्नि और पृथ्वी से सृजा यह जीवन एक लौकिक शक्ति का आलौकिक अनुभव देता है । 

          नाटक की प्रस्तुति में विचार , कल्पना , ऊर्जा एवं शरीर का अद्धभूत सात्विक मिलन है । कल्पना से नाटक की शुरुवात होते हुए , दर्शकों को ब्रह्माण्ड का दर्शन कराती है और धीरे धीरे अपने नाभि से जोड़ती है । एक एक कोषाणु का निर्माण होना , उससे बना शरीर , उसका मस्तिष्क और उस मस्तिष्क में दौड़ते विचार , प्रश्न , भावनाएं और अस्तित्व का संघर्ष इन सभी दायरों से दर्शक गुजरता है और अपने आप को छान कर हर पल शुद्ध करता है । अपने माँ के गर्भ से जन्मे इस मनुष्य को जो मानवता के मूल्यों से परिपूर्ण है , उसे अपने जीवन में अनगिनत मानसिकताओं से जूझना पड़ता है जैसे - धर्म , जात , नस्ल , रंग , लिंग , भाषा , संस्कार , परम्पराएं और समाज  । यह चुनौतियाँ यहीं नहीं रूकती... आगे शिक्षा , विज्ञान , रोज़गार , जीने का अधिकार , सत्ता के मुताबिक रेंगना और मृत्यु तक जीवन को ढोते रहना । और कहीं इस मनुष्य ने अपने जीने के अधिकार को स्पष्ट करने की जुर्रत की , तो उसे उसी पल यह बता देना की सोचना , विचार करना , निर्णय लेना ये केवल और केवल शोषणकारी , सत्ताधारी , पूँजीवादी ( लॉर्ड्स ) और ताकतवर लोगों का काम है .... जिसके पास जितनी संपत्ति की ताकत वो उतना बलशाली और शोषक , चाहे इसमें आम इंसान का जीवन पीस क्यों न जाए । 

          इस नाटक की शुद्धता इसका संतुलन है । लेखक ने बखूबी से सपने और वास्तविक जीवन को एक कलात्मक आकर में सरंचित किया है  । वाकई अपने सपनों को वास्तविकता के आधार पर आव्हान करना और उन्हें अमल में लाना यह बड़ी चुनौती है  । सपनों को पूरा करने का प्रोत्साहन , चुनौतियों से लड़ने का जज़्बा , संघर्ष का आनंद और जीतने का सुकून इन सभी स्तरों पर प्रेक्षक अपने आप को देखता है और भावनात्मक एवं वैचारिक सतह पर पुलकित हो जाता है । " गर्भ " नाटक यह उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है , जहाँ  कला के माध्यम से इस विश्व को मानवीय , बेहतरीन और शांतिप्रिय बनाने की सोच दर्शकों में जगे । जहाँ कलाकार स्वयं को सर्जक समझें और उनके गर्भ से ऐसे दर्शक जन्म लें जो कला को आत्म साक्षात्कार  का माध्यम मानें , उपभोग का साधन नहीं ।

          कलाकारों ने मस्तिष्क में प्रकट होते विचारों को दृश्य में प्रस्तुत कर दर्शकों के अलग अलग मानसिकताओं को खड़ा , जीवित किया । उनकी अभिनय शैली , आशावाद , निरंतर होते बौद्धिक प्रहार और अंत में नीला भगवत के संगीत से सजे... खूबसूरत है जिंदगी के स्वरों एवं नृत्य ने दर्शकों के मनोभाव को स्पर्श किया और अपने साथ एक अविस्मरणीय रिश्ता कायम किया है । जीवन के हर पल को जीने की बात है.. हर पल के सौंदर्य को अपने वैचारिक दृष्टि से अनुभूत करने की बात है।







" थिएटर ऑफ रेलेवंस नाट्य उत्सव 2017 " - 11 अगस्त , मुक्ताधारा ऑडिटोरियम , नई दिल्ली

नाटक - " अनहद नाद - Unheard Sounds of Universe "



          थिएटर ऑफ रेलेवंस नाट्य दर्शन अपने बदलाव की प्रक्रिया में नए नए कलात्मक तरीके खोज कर इस विश्व में अपनी जगह सृजित कर रहा है । और काल को अपनी सात्विक कलात्मकता से , नूतन आकार दे रहा है । नया आकर यानि जड़ हो चुकी प्रस्थापित व्यवस्था को तोड़ना और नई रचना बनाना । इसी बदलाव की यात्रा में जन्म लिया है नाटक " अनहद नाद - Unheard Sounds of Universe " ने , जो कला की सात्विकता पर भाष्य करता है और कलाकारों को वस्तुकरण से उन्मुक्त करता है ।

          ' अनहद नाद ' यह विषय को समझने और मनन करने के लिए पहले चिंतन प्रक्रिया होनी आव्यश्यक है । इस प्रक्रिया में मस्तिष्क के अंदर की बंजर जमीन को जोता जाता है , उसमें कलात्मक बीज बोए जाते हैं , उन्हें थिएटर ऑफ रेलेवंस की प्रक्रिया से सात्विक पोषण मिलता है और फिर उगती है फसल ऐसे कलाकारों की जो अपनी वैचारिक एवं सृजनात्मक शक्ति से  कलाजगत का निर्माण करें । दरअसल यह नाटक मात्र एक प्रस्तुति नहीं है , अपने अनुभवों , कल्पनाओं , सपनों को जीवीत कर उन्हें रंगमंच पर जीना है । अपने आप से सवांद करना है यानि अपने अंदर के नाद को सुनना है जो व्यवहारिकता में दब जाता है ।

          ऐसी कला प्रस्तुति जो हमें उन्मुक्त ना करे , वैचारिक स्तर पर हमें झकझोरे नहीं , कलात्मक चिंतन प्रक्रिया को शुरू होने से पहले ही हमें नुमाइश की मृगतृष्णा दिखाकर व्यक्तित्व बनाने की प्रक्रिया को कुचल दे , उसका चेतना निर्माण करने में कोई योगदान नही । वास्तविक दौर में नाटक को मनोरंजन की उपमा दी गयी है , 1990 के बाद कि दुनिया " खरिदो और बेचो " इस पूंजीवादी षडयंत्र के दलदल में फंस चुकी है । कोई कितना भी प्रयास करे यह व्यवस्था उसे और अंदर खिंचती है । थिएटर ऑफ रेलेवंस की प्रक्रिया एक मंथन है और नाटक " अनहद नाद " कलात्मक मौलिक प्रक्रियाओं को समझने और खंगोलने की प्रक्रिया है । जहां नाटक व्यक्तिकेंद्रित होने के बजाए , समग्रता से व्यक्तित्व का निर्माण करता है .... जहां कलाकार अभिनय करने तक सीमित नही होतें , वे अपने नाटक से अर्जित ज्ञान , तत्वों को अपने जीवन में अमल में लातें हैं और अपने जीवन तथा अपने नाटक के मालिक होते हैं ।

          थिएटर ऑफ रेलेवंस के तत्व अनुसार प्रेषक / दर्शक यह सशक्त एवं सर्वप्रथम रंगकर्मी है इसीलिए वे रंगप्रेक्षक कहलातें हैं । " अनहद नाद " के कलाकार , रंगमंच पर नही दर्शकों के मस्तिष्क के विचार मंच पर अपनी प्रस्तुति करते हैं । इसीलिए नाटक सभी को अपना लगने लगता है , और नाटक के कलाकारों के साथ साथ प्रेक्षकों की भी अलग यात्रा शुरू होती है ।



          " अनहद नाद " यह नाटक प्रेक्षकों के लिए एक " पवित्र , सात्विक और शुद्ध " कला का स्वरूप है जो यथार्थ में जीवित है । कला के नाम पर तथाकथित अभिव्यक्तियाँ केवल और केवल उपभोग की सामग्री बन चुकी हैं , इनमें ना नयेपन की खोज है , ना कलात्मक सुकून , ना दृष्टि संपन्नता । नाटक " अनहद नाद " ने प्रेक्षकों के भीतर की रुमानियत से रूबरू किया और नाट्य संकल्पना की परिभाषा बदल दी। यह नाटक एक सत्संग है जहां सभी अपने मनोभाव को खुलेपन के साथ अभिव्यक्त कर सकते हैं । थिएटर ऑफ रेलेवंस नाट्यदर्शन के अंतर्गत नाटक , जनचेतना का निर्माण करते हैं , जहां अबतक के नाट्यविशेषज्ञ नहीं पहुंच पाए वहां थिएटर ऑफ रेलेवंस के नाटकों ने बदलाव का बिगुल बजाया है ।



          नाटक की रूप - रेखा , संगीत , रचना , शब्द उपुयोग , विचार , कलात्मक ऊर्जा और दृश्य रचना यही " अनहद नाद " का नाट्य सौंदर्य है। पंछियों का चहचहाना , नदी का प्रवाह , जंगल , बर्फ , बाढ़ , अजगर , बारिश और हिम के आंचल में अपनी दृढ़ता से खड़ा , अडिग एवरेस्ट पर्वत इन सभी के समावेश ने मनुष्य के प्रकृति को प्रकृति से मिलवाया है , और मानवीय संवेदना को अमानवीय एवं कृत्रिम बनानेवाली मानसिकता को झकझोरा है । अपने गंतव्य को खोजने की बात है , अपनी अंदर की आवाज़ को सुनने और सुनाने की बात है । जीने के अर्थ को समझना और लक्ष्य को सामने रखते हुए सजगता से चैतन्य पराकाष्ठा को साधना यही जीवन का मकसद है । और कला में मानवीय विष को पीने की ताक़त है।

हम हैं !!

लेखक एवं निर्देशक - मंजुल भारद्वाज ( विश्वविख्यात रंगचिंतक एवं दार्शनिक ) 

कलाकार - अश्विनी नांदेडकर , सयाली पावसकर , कोमल खामकर , योगिनी चौक , तुषार म्हस्के 

संगीत - नीला भागवत ( गर्भ )
           अश्विनी नांदेड़कर , सायली पावसकर , कोमल खामकर , योगिनी चौक , तुषार म्हस्के ( अनहद नाद - Unheard Sounds of Universe )

प्रकाश योजना - संकेत आवळे 

" थिएटर ऑफ रेलेवंस नाट्य उत्सव 2017 " - 12 अगस्त , म. ल. भारतीय ऑडिटोरियम , लोधी एस्टेट , नई दिल्ली

नाटक -  " न्याय के भंवर में भंवरी "



          हर मनुष्य को अपने जीने का संघर्ष करना होता है , लेकिन समाज में महिला को केवल जीने का ही नही उसके अस्तित्व का भी संघर्ष करना पड़ता है । इस पितृसत्तात्मक मानसिकता ने महिला को संपत्ति की जगह रख कर उसे केवल वस्तु तक मर्यादित किया है । नाटक " न्याय के भंवर में भंवरी " का अर्क यही है , अपने आप पर होते लैंगिक , सामाजिक , मानसिक , शारीरिक शोषण से मुक्त होना और अपने दृढ़ इच्छाशक्ति से अपने अस्तित्व के लिए लड़ते हुए इस विश्व को न्याय और नीतिसंगत बनाना ।



           इस नाटक की प्रस्तुति म. ल. भारतीय ऑडिटोरियम , लोधी एस्टेट में हुई , जहां विशेषकर जागतिक प्रस्तुतियां की जाती हैं । इस नाट्य प्रस्तुति को देखने के लिए विशेष प्रेक्षक मौजूद रहें - गांवों , कस्बों की साधारण महिलाएं , सर पर घुंगट , गले में विवाह पश्च्यात पहना हुआ पट्टा (मंगलसूत्र) , सौभाग्य के सारे अविष्कारों के नीचे दबी और स्वयं का विज्ञापन करती हुई " महिलाएं " , जेंडर का प्रशिक्षण देने के नाम पर अपना पेट भरने वाले सामाजिक कार्यकर्ता , पुरुष का नक़ाब पहने हुए " मर्द " और जिज्ञासु एवं उत्सुक थिएटर ऑफ़ रेलेवंस रंगदर्शक ।



           नाटक की संकल्पना , " मर्दानगी " वाली मानसिकता को चुनौती देती है क्योंकि यह नाटक पुरुषों और औरतों पर नही बल्कि इनका शोषण करने वाली मर्द मानसिकता पर भाष्य करता है । इस पितृसत्तात्मक कुचक्र के खेल में केवल महिला नहीं पुरुष भी रौंदा जाता है क्योंकि वो मर्दों वाले नियम को नही समझता । मर्दानगी की मानसिकता "सत्ता और संपत्ति" पर टिकी है , और यही वो 2 बिंदु हैं जिसने इंसानियत को खत्म कर दिया । लालच , हवस , स्वार्थ , लोभ बढ़ता गया और मानवता छोटी होती चली गयी । इस सत्ता के खेल में फंसा पुरुष और शिकार हुई महिला , और तृतीया पंथी हाशिये से बाहर। नाटक के लेखन से पता चलता है की लेखकने समाज की अति सुक्ष्म विषयों को तथ्य के साथ सम्प्रेषित किया है । लेखक जेंडर विषय के प्रति संवेदनशील है , दोषारोपण नहीं समाज की सही बीमारी की तफ्तीश , केवल सवाल नहीं तथ्य के साथ वैचारिक स्पष्टता एवं उन प्रश्नों का सही समाधान भी नाटक में सूचित किया है ।



          औरत की पहचान उसके शरीर से परे उसके अस्तित्व में है , व्यक्तित्व में है । वो एक सृजन शक्ति है , निर्मल प्रकृति है । नाटक की एकमेव कलाकार " बबली रावत " ने प्रस्तुति को परिपक्वता के साथ जिया , विचार को दर्शकों तक पहुँचाने में वे यशस्वी रहीं , अपने अभिनय कौशल से उन्होंने सारी महिलाओं में भंवरी की ज्वाला जलाई और अंत में एक ही बुलंद आवाज़ थी - " मैं तो लहे की बनी हूँ... पक्की दृढ़ इच्छाशक्ति की हूँ  " । आज के युग में जहाँ " सच्चाई " का नाम " दंड " है, वहां इतनी वैचारिक स्पष्टता के साथ , अपने कार्य से प्रतिबद्ध और शोषणकारी सत्ता के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले विद्रोही कलाकार कौन और कहाँ है ? दिल्ली के सांस्कृतिक भूमि पर एक नया इतिहास रचा है थिएटर ऑफ़ रेलेवंस ने । इन कलासाधकों का न कोई विशेष धर्म है , न जात , न रंग है , न विशेष भाषा ..... ये सर्वव्यापी , सार्वभौमिक , यूनिवर्सल हैं । यह रंगमंच के साथ साथ दर्शकों के मस्तिष्क में प्रवेश (entry) करतें हैं , लेकिन इनका प्रस्थान (exit) नहीं होता !!

लेखक एवं निर्देशक - मंजुल भारद्वाज ( विश्वविख्यात रंगचिंतक एवं दार्शनिक ) 

कलाकार - बबली रावत 

संगीत - अश्विनी नांदेड़कर , सायली पावसकर , कोमल खामकर , योगिनी चौक , तुषार म्हस्के ( न्याय के भंवर में भंवरी )

प्रकाश योजना - संकेत आवळे 

रंगाप्रेक्षकों से संवाद 



          इन तीन दिन की रंग प्रस्तुति की विशेषता थी ' हॉउसफुल ऑडियंस ' , जी हां रंगप्रेक्षकों ने हमारा साथ दिया । यानि जहां नाटक को देखने के लिए विशेष ' एंट्री पासेस ' , अपने ही जान पहचान वालों को बुलाना , नाट्यगृह के कुरचियों को भीड़ से भरना और यह ऐलान करना कि थिएटर हाउस फुल है इस षडयंत्र / झूठ को थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के रंगकर्मियों ने तोड़ा और अपने कलात्मक चिंतन से , साधना से , तपस्या से और विचारों से जनता को जोड़ा और नये काल का निर्माण किया , यानि हमारा नाटक दर्शकों ने अपनाया जिसमें समीक्षक , नाट्य प्रेमी , तथाकथित नाट्याचिन्तक , नाटक के नवोदित कलाकार , राजकीय क्षेत्र के दार्शनिक सभी सहभागी थे ।

          नाट्य शैली किस प्रकार की हो , लेखन में कौनसे विचार सम्प्रेषित होने आवश्यक हैं , नाटक लिखते समय कौनसे विषयों का अभ्यास होना आवश्यक हैं , अभिनय और संहिता के शब्दों का मिलन , दृश्य से विचार को ठोस रूप देना , आवाज़ के संगीत में मोक्ष मिलना , तकनीक की सीमाओं तक सिमित न रहते हुए स्वयं संगीत , नेपथ्य , रूप रेखा की रचना करना , व्यक्तिगत से शारीरिक , मानसिक , भावनिक , आत्मिक , लैंगिक और फिर सामाजिक , शैक्षणिक , पारिवारिक , राजनैतिक और सार्वभौमिक स्तर पर विचार मंथन करना और फिर उनकी प्रस्तुति करना । 

          थिएटर ऑफ़ रेलेवंस का मकसद है कला के मूल उद्देश्य को फैलाना - मानवीय विष को निष्क्रिय करना । अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाये रखना और उसकी सात्विकता से ऐसे कलाजगत का निर्माण करना जिसमें मानवता और प्रकृति का संतुलन हो , सौहार्द हो , कलात्मकता हो । जहाँ शन्ति के नाम पर युद्ध न हो , समानता के नाम पर अत्याचार न हो , शिक्षा के नाम पर व्यापार न हो , अध्यात्म के नाम पर अंधश्रद्धा न हो , राजनीती के नाम पर जुमलेबाजी न हो और कला के नाम पर बाजारीकरण न हो । 



सत्यमेव जयते ....कलामेव जयते !!

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस अभ्यासक एवं परफ़ॉर्मर 
कोमल खामकर ( कठोर )

Wednesday, 20 September 2017

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस - सक्षमता की शुरुवात पहले स्वयं से....

 सक्षमता की शुरुवात होती है पहले स्वयं से... फिर स्वयं के साथ परिवार को सक्षम करना और परिवार से अपने समाज की ओर बढ़ना ... और जैसे जैसे समाज अपनी नयी सकारात्मक और रचनात्मक निर्माण की ओर बढ़ता है देश अपने आप सक्षम हो जाता है । यही अनुभव , मैं थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत की प्रक्रिया में जीती आ रहीं हूँ.. मैंने पहले अपने आप को इस प्रक्रिया से जोड़ा " मैं औरत हूँ " इस नाटक के जरिये.. जब मैंने अश्विनी नांदेडकर और सायली पावसकर इन दो कलाकारों के सात्विक कलाकृति को देखा , समझा , उसकी गहराई को महसूस किया ... तब मुझे यह एहसास हुआ की यह नाटक नहीं जीवन कथा है । अपने आप को देखने का आईना है , अपने आप से जूझना है । यह नाटक देखकर मेरे मस्तिष्क में घूम रहा समय का चक्र भूत की दिशा में दौड़ने लगा और मुझे वो सारे पल , क्षण , लम्हें याद आये जब मैं अपने आप को पल पल ढूंढती थी... ।

          किसी की जीवन संगिनी होना , साथी होना ये अपने आप में एक बराबरी का भाव , विचार लाता है , लेकिन एक वस्तु बनकर अपने अस्तित्व को किसी कोने में दफनाकर हमेशा के लिए एक उपभोग बनकर जीना मुझे सिर्फ एक शरीर तक सीमित कर देता है । मैं इस शरीर के परे एक पहचान के स्वरुप में जीना चाहती हूँ ... और मुझे ये अवसर थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने दिया ।

          यह नाट्य दर्शन १२ अगस्त १९९२ को दुनिया के विख्यात रंगचिंतक , रंगप्रेमी , रंगकर्मी मंजुल भारद्वाज जी ने सूत्रपात किया है और वे इस नाट्य दर्शन के अभ्यासक भी है । थिएटर ऑफ़ रेलेवंस का मूल है नक़ाब उतारना और अपने आप से मिलना । इस प्रक्रिया के अंतर्गत नाटकों का ध्येय रंजन से परे विश्व में रचनात्मक बदलाव लाना है । और मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित एवं निर्देशित नाटक - " मैं औरत हूँ  " का लक्ष्य  है शरीर की पहचान से परे अस्तित्व और व्यक्तित्व का निर्माण करना..!

          एक कलाकार के तौर पर जब मैंने अपने आप को रचना शुरू किया तब मैं एक व्यक्ति के रूप में भी ठोस अवतार लेने लगी । थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की खासियत / विशेषता यही है की यह प्रक्रिया हमें भीतर से जाग्रत  करती है और अपने अंदर की चेतना को जगाकर , अपने प्राकृतिक स्वभाव का परिपोषण कर हमें एक सात्विक मनुष्य बनाती है । नाटक झूठ होता है या यूँ कहें घटित घटनाओं को जागरूकता के साथ फिर से प्रस्तुत करना होता है , और जिंदगी सच होती है , अनुभवों से सम्पन्न होती है इसीलिए जिंदगी में हम जीने का नाटक नहीं करते और ये प्रक्रिया हमें जीवन जीने का हौंसला देती है तथा रंगमंच पर नाटक करने की सीख।



          थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की  ये प्रक्रिया परिवार को अपने से जोड़ती है जैसे - मैंने अपना हर अनुभव अपने परिवार के साथ बांटा चाहे वह किसी नाट्य प्रयोग का हो ,  कार्यशालाओं का , या किसी रिहर्सल का ! जिससे उनमें आगे की जिज्ञासा जागी , नयापन को सुनाने की सोच बढ़ी और इतना ही नहीं प्रयोग के आयोजन में वे मेरा साथ देने लगे । मेरी माँ ने " मैं औरत हूँ " का प्रयोग अपने घर इस साल के रक्षाबंधन पर  आयोजित किया । श्रुतिका , जिसने अपने आप को बेटी , बहन , बीवी , माँ से परे एक व्यक्तित्व के रूप में प्रथम देखा । इस  नाटक ने मुझे और मेरी माँ को उन्मुक्त किया , हम दोनों में एक कलात्मक रिश्ता बनाया । इस रिश्ते को और आगे बढ़ाने के लिए ७ अगस्त २०१७ को शाम ८ बजे , डोम्बिवली में यह प्रयोग सम्पन्न हुआ , जिसमें मैंने , अश्विनी और सयाली ने नाट्य प्रस्तुति की और ५०-५५ रंगप्रेक्षकों ने हमारा साथ दिया । यह एहसास होना की स्री का अपना एक व्यक्तित्व है , एक खुला अस्तित्व है , अपनी एक अलग सोच है और अपना कलात्मक विचार है , वह एक सृजनशक्ति है - यह सब मेरे होने का सबूत है । रंगप्रेक्षकों के साथ हुआ खुला सवांद - कपड़े मायने नहीं करते सोच मायने रखती है , वेदों में भी शक्ति का रूप देवी को दिखाया गया है इसीलिए स्त्री  पहले से सर्वश्रेष्ठ है , हर एक विचार स्पष्ट होते गए ... और मेरे मन में यह खयाल आया की मैंने कुछ नहीं खोया बल्कि रिश्ते , विचार , नयी सोच , व्यक्तित्व , मेरी शारीरिक सुरक्षा और मेरी कलात्मकता को नए अवतार में पाया है ।

          रक्षाबंधन यह त्यौहार केवल भावनाओं के आधार पर मनाया जाता था , लेकिन अब से लेकर आगे यह त्यौहार विचार के साथ मनाया जायेगा और यादगार बनेगा । मैं धन्यवाद करती हूँ थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की प्रक्रिया को जिसने मुझे हर पल चुनौतियों का सामना करना सीखाया , मंजुल भारद्वाज को जिन्होंने मुझे स्वीकार कर मुझमें  एक नयी व्यक्तित्व की मूर्ति का निर्माण किया , मैं धन्यवाद करती हूँ मेरी साथी अश्विनी और सायली को जिन्होंने हर क्षण मेरा साथ दिया और मेरे व्यक्तित्व को आकार देने में मेरे हमसफ़र बनें और मेरी माँ का जिसने मुझे सृजित किया और मेरे अस्तित्व के निर्माण के लिए सपना देखा और उसे सच किया ।

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस अभ्यासक एवं परफ़ॉर्मर
  कठोर
( कोमल खामकर )
komalkhamkar08@gmail.com