सक्षमता की शुरुवात होती है पहले स्वयं से... फिर स्वयं के साथ परिवार को सक्षम करना और परिवार से अपने समाज की ओर बढ़ना ... और जैसे जैसे समाज अपनी नयी सकारात्मक और रचनात्मक निर्माण की ओर बढ़ता है देश अपने आप सक्षम हो जाता है । यही अनुभव , मैं थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत की प्रक्रिया में जीती आ रहीं हूँ.. मैंने पहले अपने आप को इस प्रक्रिया से जोड़ा " मैं औरत हूँ " इस नाटक के जरिये.. जब मैंने अश्विनी नांदेडकर और सायली पावसकर इन दो कलाकारों के सात्विक कलाकृति को देखा , समझा , उसकी गहराई को महसूस किया ... तब मुझे यह एहसास हुआ की यह नाटक नहीं जीवन कथा है । अपने आप को देखने का आईना है , अपने आप से जूझना है । यह नाटक देखकर मेरे मस्तिष्क में घूम रहा समय का चक्र भूत की दिशा में दौड़ने लगा और मुझे वो सारे पल , क्षण , लम्हें याद आये जब मैं अपने आप को पल पल ढूंढती थी... ।
किसी की जीवन संगिनी होना , साथी होना ये अपने आप में एक बराबरी का भाव , विचार लाता है , लेकिन एक वस्तु बनकर अपने अस्तित्व को किसी कोने में दफनाकर हमेशा के लिए एक उपभोग बनकर जीना मुझे सिर्फ एक शरीर तक सीमित कर देता है । मैं इस शरीर के परे एक पहचान के स्वरुप में जीना चाहती हूँ ... और मुझे ये अवसर थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने दिया ।
यह नाट्य दर्शन १२ अगस्त १९९२ को दुनिया के विख्यात रंगचिंतक , रंगप्रेमी , रंगकर्मी मंजुल भारद्वाज जी ने सूत्रपात किया है और वे इस नाट्य दर्शन के अभ्यासक भी है । थिएटर ऑफ़ रेलेवंस का मूल है नक़ाब उतारना और अपने आप से मिलना । इस प्रक्रिया के अंतर्गत नाटकों का ध्येय रंजन से परे विश्व में रचनात्मक बदलाव लाना है । और मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित एवं निर्देशित नाटक - " मैं औरत हूँ " का लक्ष्य है शरीर की पहचान से परे अस्तित्व और व्यक्तित्व का निर्माण करना..!
एक कलाकार के तौर पर जब मैंने अपने आप को रचना शुरू किया तब मैं एक व्यक्ति के रूप में भी ठोस अवतार लेने लगी । थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की खासियत / विशेषता यही है की यह प्रक्रिया हमें भीतर से जाग्रत करती है और अपने अंदर की चेतना को जगाकर , अपने प्राकृतिक स्वभाव का परिपोषण कर हमें एक सात्विक मनुष्य बनाती है । नाटक झूठ होता है या यूँ कहें घटित घटनाओं को जागरूकता के साथ फिर से प्रस्तुत करना होता है , और जिंदगी सच होती है , अनुभवों से सम्पन्न होती है इसीलिए जिंदगी में हम जीने का नाटक नहीं करते और ये प्रक्रिया हमें जीवन जीने का हौंसला देती है तथा रंगमंच पर नाटक करने की सीख।
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की ये प्रक्रिया परिवार को अपने से जोड़ती है जैसे - मैंने अपना हर अनुभव अपने परिवार के साथ बांटा चाहे वह किसी नाट्य प्रयोग का हो , कार्यशालाओं का , या किसी रिहर्सल का ! जिससे उनमें आगे की जिज्ञासा जागी , नयापन को सुनाने की सोच बढ़ी और इतना ही नहीं प्रयोग के आयोजन में वे मेरा साथ देने लगे । मेरी माँ ने " मैं औरत हूँ " का प्रयोग अपने घर इस साल के रक्षाबंधन पर आयोजित किया । श्रुतिका , जिसने अपने आप को बेटी , बहन , बीवी , माँ से परे एक व्यक्तित्व के रूप में प्रथम देखा । इस नाटक ने मुझे और मेरी माँ को उन्मुक्त किया , हम दोनों में एक कलात्मक रिश्ता बनाया । इस रिश्ते को और आगे बढ़ाने के लिए ७ अगस्त २०१७ को शाम ८ बजे , डोम्बिवली में यह प्रयोग सम्पन्न हुआ , जिसमें मैंने , अश्विनी और सयाली ने नाट्य प्रस्तुति की और ५०-५५ रंगप्रेक्षकों ने हमारा साथ दिया । यह एहसास होना की स्री का अपना एक व्यक्तित्व है , एक खुला अस्तित्व है , अपनी एक अलग सोच है और अपना कलात्मक विचार है , वह एक सृजनशक्ति है - यह सब मेरे होने का सबूत है । रंगप्रेक्षकों के साथ हुआ खुला सवांद - कपड़े मायने नहीं करते सोच मायने रखती है , वेदों में भी शक्ति का रूप देवी को दिखाया गया है इसीलिए स्त्री पहले से सर्वश्रेष्ठ है , हर एक विचार स्पष्ट होते गए ... और मेरे मन में यह खयाल आया की मैंने कुछ नहीं खोया बल्कि रिश्ते , विचार , नयी सोच , व्यक्तित्व , मेरी शारीरिक सुरक्षा और मेरी कलात्मकता को नए अवतार में पाया है ।
रक्षाबंधन यह त्यौहार केवल भावनाओं के आधार पर मनाया जाता था , लेकिन अब से लेकर आगे यह त्यौहार विचार के साथ मनाया जायेगा और यादगार बनेगा । मैं धन्यवाद करती हूँ थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की प्रक्रिया को जिसने मुझे हर पल चुनौतियों का सामना करना सीखाया , मंजुल भारद्वाज को जिन्होंने मुझे स्वीकार कर मुझमें एक नयी व्यक्तित्व की मूर्ति का निर्माण किया , मैं धन्यवाद करती हूँ मेरी साथी अश्विनी और सायली को जिन्होंने हर क्षण मेरा साथ दिया और मेरे व्यक्तित्व को आकार देने में मेरे हमसफ़र बनें और मेरी माँ का जिसने मुझे सृजित किया और मेरे अस्तित्व के निर्माण के लिए सपना देखा और उसे सच किया ।
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस अभ्यासक एवं परफ़ॉर्मर
कठोर
( कोमल खामकर )
komalkhamkar08@gmail.com
komalkhamkar08@gmail.com

Waah komal bahot khub likha hai!!
ReplyDeleteThankyou Yogini Chouk
DeleteThanks Tushar Mhaske
ReplyDeleteWahaa komal mast lihles..
ReplyDeletethankyou Swati Wagh
Deletehe tuz pravas varnan jitaka athang disat ahe titakech te samruddh dekhil aahe..aani anubhav ha kasturi sarakha sugandhit asava. Jya kshani to havet misalel tyach velela saara vatavaran ulhasit houn jaat prerit houn jat..tuza ha pravas ha anubhav asach amhala prerit ani ulhasit karatoy. Keep rocking komal.
ReplyDeletethankyou so much kiran....khup sundar response
DeleteVery Nice..
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