Thursday, 9 November 2017

शुद्धता की ओर...

शुद्धता की ओर...

" मैंने देखा है उस चाँद को जो जोर जोर से गाता है !! " - नाटक अनहद नाद Unheard Sounds of Universe का यह संवाद मुझे याद आया जब मैंने उगते हुए पूर्णिमा को देखा .... उस शुद्धता के स्वरुप को अनुभव किया जो मुझे मेरे होने का एहसास कराती है... शुद्ध , पवित्र , सात्विकता को थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की मौलिक प्रक्रियाओं से मैंने साध्य किया है !! अपनी संकल्पनाओं को नए कलात्मक आकार में मैंने सरंचित किया है... अपने आप से आत्मीयता महसूस होने लगी है.. थिएटर ऑफ़ रेलेवंस प्रक्रिया केवल शारीरिक कलाकारों का निर्माण नहीं करती , विचारों का परिवर्तन कर शरीर में प्राण फूंकती है जिससे चेतना जागृत होती है , और जिंदगी के हर पल को , हर क्षण को जीने और हर चुनौती का सामना करने का हौंसला बढाती है... चिंतन बढाती है , मानवीय संवेदनाएं बढाती है ... मनुष्य को मनुष्य बनाये रखती है , क्योंकि यह मानवीय कलात्मक प्रक्रिया है... यह अपने आप को जानने की एक सृजनशील प्रक्रिया है , जो समाधान की और ले जाती है...



चैतन्य अभ्यास , मानव के शारीरिक , मानसिक , भावनिक , आत्मिक एकरूपता के संतुलन का अभ्यास है... निसर्ग यह शुद्धता का स्वरुप है , और मनुष्य निसर्ग के 5 तत्वों से निर्मित हुआ है , जल , वायु , धरती , अग्नि , आकाश....और इन्ही पंचतत्वों से सृजन होता है एक और तत्व का जिसे हम इंसानियत कहते हैं... इसी चैतन्य अभ्यास में हम कलाकार अपने अन्दर के इंसानियत को सुदृढ करते हैं... एक कलाकार के साथ साथ व्यक्ति की यात्रा भी शुरू होती है... सिर्फ प्रस्तुतीकरण तक सिमित न होकर , जीवन जीने के लिए यह प्रक्रिया प्रेरित करती है..



जीवन मतलब पहल करना , और जो पहल करता है वो अपना भाग्य खुद लिखता है... वो अपनी जिंदगी को ढोता नहीं उसे जीता है... थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के कलासाधकों ने कला के नए रचनात्मक मापदंडों को स्थापित करने की पहल करके , अपने जीवन को कला के लिए समर्पित किया है... यहाँ समर्पण का अर्थ है पुरे लगन , दृढ़ संकल्प , अपनी चेतना और कलात्मक आनंद के साथ जिंदगी के हर पल को जीना.. इस कलात्मकता का आनंद लेते हुए , विश्व को सौहार्दपूर्ण दृष्टी से देखना...



अपनी कल्पनाओं को ठोस आकर देकर एक संकल्प का निर्माण करना... और यह संकल्प दिल्ली की सांस्कृतिक भूमि पर अपनी कलात्मकता स्थापित कर चूका है... थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के 25 वर्ष कलात्मक रंगयात्रा के उपलक्ष में अब बारी है मुंबई की.. इस नाट्य दर्शन के जनक मंजुल भारद्वाज द्वारा लिखित एवं निर्देशित 3 नाटकों की प्रस्तुति 15 , 16 और 17 नवम्बर 2017 को शिवाजी मंदिर , दादर , मुंबई में होने वाली है... इसमें शुभारंभ होगा नाटक " गर्भ " से जो मनुष्य का मनुष्य बने रहने का संगर्ष है ... दुसरे दिन " अनहद नाद - Unheard Sounds of Universe " को कला और कलाकारों को बाजारीकरण से मुक्त करता है और कलात्मक उन्मुक्तता का नाद है .... और तीसरे दिन गूंजेगी न्याय , समता और समानता की हुंकार - " न्याय के भंवर में भंवरी "... 



इन वैचारिक , चेतनात्मक नाटकों को थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के सृजनशील कलाकार एवं प्रतिबद्ध अभ्यासक बबली रावत , अश्विनी नांदेडकर , योगिनी चौक , कोमल खामकर , सायली पावसकर और तुषार म्हस्के प्रस्तुत करेंगे... इस ऐतिहासिक नाट्य उत्सव में सभी रंगप्रेक्षकों के सहभाग का हार्दिक स्वागत है ....



komalkhamkar08@gmail.com 

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