बंदो में हैं दम.. वन्दे मातरम्...
आज भारत के सामने कईं प्रश्न हैं, उनमें से महत्वपूर्ण प्रश्न है - "हम कौन हैं ?".. क्या हम लिंग हैं - महिला , पुरुष , लड़का , लड़की... क्या हम धर्म हैं - हिन्दू , मुस्लिम , सिख , ईसाई , बहुजन.. क्या हम वर्ग हैं - ब्राह्मण , क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र... क्या हम पद हैं - डॉक्टर, राजनेता, शिक्षक, मजदुर, सिपाही... या अपने अन्दर झांके और पूछे - क्या हम इंसान हैं ? - इंसान , इंसानियत....
बाजारवाद ने इंसानियत को खत्म करने का नया और प्रभावशाली हथियार चुना है खरीदो और बेचो, जो मनुष्य में बसी संवेदनाएं, भावनाएं और विचारों को खरीद कर उन्हें एक चलते फिरते शरिर तक में सिमित कर देता है, जिसके कारण मनुष्य अपने होने को नकार कर जीवन जीने से अलिप्त रहता है.. इस दौर में जहाँ बाजारवाद दिन भर दिन बढ़ता जा रहा है , जहाँ खुशियाँ खरीदी जाती है और विचार एवं तत्त्व बेचे जाते हैं वहां इंसानियत का टिकना मुश्किल होता है ! जैसे पेड़ से पत्तो का गिरना उन्हें मुरझा देता है , वैसेही मानवता के तत्त्व की जड़ से हम अलग हो जाये तो जीवन का मुरझा जाना निश्चित है...
हमारे देश को युवाओं के चैतन्यता की आवश्यकता है, जिसके लिए युवाओं का सकारात्मक एवं रचनात्मक तरीके से वैचारिक पोषण होना अनिवार्य है.. और इसीलिए थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्यप्रक्रिया पहल करती है - नाटक के माध्यम से स्वयं एवं सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, शैक्षणिक, वैचारिक स्तर पर रचनात्मक परिवर्तन.. यह बदलाव की कलात्मक प्रक्रिया है..
हमने देखा है संघर्ष गांधी, भगत सिंह, अंबेडकर और कार्ल मार्क्स का , उनके जीवन को जीया है नाटक के माध्यम से नयी दृष्टी के साथ। अपने आपको परिचित किया है अपने भीतर की उन कोषिकाओं से जो इन क्रांतिवीरों में हुआ करती थीं। भारत की संस्कृति है - आत्मखोज और यही संस्कृति हमें भीतर से मजबूत बनाती है और चेतनात्मक व्यक्तित्व का निर्माण करती है..
आज के युवाओं की चुनौतियां क्या है - इंटरनेट , मोबाइल , बाजारवाद , भावनाओं को दिशा , संगत और अब आगे क्या करें ... उद्देश्य हो, ध्येय हो, अपने होने को साबित करने का तरीका स्पष्ट हो तो यह युवा भगत सिंह कहलाते हैं , अपने आप को पहचानना हमें गांधी बनाता है , अपना चिंतन प्रबुद्ध करता है । लेकिन आज गांधी की एहमियत केवल नोटों तक में दिखती है, यह दुर्भाग्य है।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस अंतर्गत प्रक्रियाओं का हासिल रहा -
1. युवाओं ने खोजा अभिव्यक्ति का अपना तरीका.. संवाद के माध्यम से जुड़े स्वयं से, अपनी जमीन से, सपनों से और समूह से.
2. स्वयं नियोजन, निर्णय एवं नियोजन का प्रवर्तन.
3. सहभागिता और पहल.
4. अपनी चुनौतियों को नाटक के माध्यम से पहचानना और उनपर स्वयं समाधान खोजना.
5. चैतन्य अभ्यास द्वारा अपने चिंतन को बढ़ाना..
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस के नाटकों की विशेषता है की वे कलाकार को व्यक्तिगत प्रक्रीयाओं से रूबरू कराते हैं. अपने अन्दर झाँकने के लिए प्रेरित करते हैं और अपने अन्दर की सकारात्मक इच्छाशक्ति, कल्पनाशक्ति को बाहर निकाल कर व्यक्ति को उसके गुणों से परिचित कराते हैं.. मुझे अपने साथ साथ अपने समूह को , अपने परिवार को , अपने समाज को और अपने देश को आगे लेकर जाने की जिम्मेदारी निभानी है.. और इसीलिए विशेषकर व्यक्ति सचेतन , शुद्ध और सच्चा होना अनिवार्य है..
सहभागियों के स्वभाव, चिंतन, विचार, संकल्पनाएँ और अनुभव के बारीक़ आयामों पर लक्षपूर्वक मार्गदर्शन किया रंगचिन्तक मंजुल भारद्वाज ने.. हर चुनौती को सुलझाने का अलग तरीका होता है और अलग तरीके की खोज हमें आत्मखोज की तरफ ले जाती है.
कठोर
14 से 18 अप्रैल 2018
युसूफ मेंहर अली सेंटर , पनवेल
उत्प्रेरक - वैश्वक रंगचिंतक एवं दार्शनिक मंजुल भारद्वाज



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