22 , 23 , 24 अक्टूबर 2017
राजाजी पथ ,डोम्बिवली ( पू ),
मुंबई.
दि एक्सपेरिमेंटल थिएटर फाउंडेशन आयोजित " थिएटर ऑफ़ रेलेवंस बालनाट्य कार्यशाला - आओ अभिव्यक्त होते हैं " के ३ दिवसीय प्रयोगशाला में " अभिव्यक्ति " की खूबसूरत प्रक्रिया के माध्यम से सहभागी अपने आप से रूबरू हुए !
अभिव्यक्त होना कितना जरुरी है , कोई हो न हो , हम अपने आप के सच्चे और प्रतिबद्ध दोस्त होते हैं यह विश्वास निर्माण हुआ.. नयापन , नये दोस्त , नया स्वभाव , नयी सोच , नयी दृष्टी को सहभागियों ने स्वीकार किया , अपने आप को थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के कलात्मक प्रक्रियाओं में खंगोला और अपने भीतर की सृजनात्मक कलाकृति को निर्माण किया.. नाटक यानि अभिव्यक्त होने का माध्यम , इस नाटक सीखने की प्रक्रियाओं से सहभागियों ने अपने जीवन के सीख को भी प्राप्त किया और उसे अपने जीवन में अमल में लाने की ठान ली. एक रचनात्मक और सकारात्मक दिशा से जुड़े यह बच्चे अपने जीवन में परिवर्तन लाने के लिए तैयार होने लगे.
नाटक का मतलब केवल अभिनय करना नहीं होता.. नाटक की परिभाषा अभिनय शैली से परे है... नाटक का मतलब अपने आप से संवाद करना और अपने विचारों को स्थूल स्वरुप में आकर देना यानि मानसिक स्तर का शारीरिक रूप से जुडाव होना... नाटक यानि विचार , विचार यानि खोज , खोज मतलब नयापन और हर पल नयापन मतलब बचपन !! इस बाल्यकाल की अवस्था में इन सहभागियों ने खुद को रूढ़ि वादी संस्कारों में कैद करने के बजाये , कलात्मक रूप से स्वयं को उन्मुक्त किया !!
हम समानता को मानते हैं , लेकिन क्या इस तत्व को अपने जीवन में कभी जीते हैं ? क्या इस तत्त्व की गहराई को कभी समझा है ? थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की बालनाट्य कार्यशाला ने इस तत्व के अर्थ को स्पष्ट किया , बच्चों के व्यवहार से यह समझ आया की घर , परिवार और समाज में इन्हें अलग अलग नजरिये से देखा , समझा और अनुभूत किया जाता है जैसे लड़के को खुलापन लेकिन लड़की के हर कृति , व्यवहार पर नजर रखना ! अपनी जगह निर्माण न करने देना , आवाज़ , भावना , इच्छाएं इन सभी अभिव्यक्ति के माध्यमों पर नियंत्रण रखना ! ऐसे में थिएटर ऑफ़ रेलेवंस का तत्व - " मनुष्य को मनुष्य बने रखने की प्रक्रिया " खुद को अभिव्यक्त होने के लिए हौंसला बढाती है ! नाटक की प्रस्तुति से सहभागियों में यह विश्वास जगा की " में हूँ ... यह जगह मेरी है , यह जीवन मेरा है.. हम हैं "..
डर.. हिम्मत में परावर्तित हुआ , फुसफुसाहट .. बुलंद आवाज़ में बदल गयी , छुपे चेहरे ... खिलने और हसने लगे ... और उन्मुक्त दृष्टी से उन्मुक्त जीवन की सृजना होने लगी... इस कार्यशाला की यह विशेषता रही की हम खुद को इंसान मानने , समझने और अनुभव करने लगे !
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस अभ्यासक एवं रंगकर्मी
कोमल खामकर
komalkhamkar08@gmail.com
राजाजी पथ ,डोम्बिवली ( पू ),
मुंबई.
दि एक्सपेरिमेंटल थिएटर फाउंडेशन आयोजित " थिएटर ऑफ़ रेलेवंस बालनाट्य कार्यशाला - आओ अभिव्यक्त होते हैं " के ३ दिवसीय प्रयोगशाला में " अभिव्यक्ति " की खूबसूरत प्रक्रिया के माध्यम से सहभागी अपने आप से रूबरू हुए !
अभिव्यक्त होना कितना जरुरी है , कोई हो न हो , हम अपने आप के सच्चे और प्रतिबद्ध दोस्त होते हैं यह विश्वास निर्माण हुआ.. नयापन , नये दोस्त , नया स्वभाव , नयी सोच , नयी दृष्टी को सहभागियों ने स्वीकार किया , अपने आप को थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के कलात्मक प्रक्रियाओं में खंगोला और अपने भीतर की सृजनात्मक कलाकृति को निर्माण किया.. नाटक यानि अभिव्यक्त होने का माध्यम , इस नाटक सीखने की प्रक्रियाओं से सहभागियों ने अपने जीवन के सीख को भी प्राप्त किया और उसे अपने जीवन में अमल में लाने की ठान ली. एक रचनात्मक और सकारात्मक दिशा से जुड़े यह बच्चे अपने जीवन में परिवर्तन लाने के लिए तैयार होने लगे.
नाटक का मतलब केवल अभिनय करना नहीं होता.. नाटक की परिभाषा अभिनय शैली से परे है... नाटक का मतलब अपने आप से संवाद करना और अपने विचारों को स्थूल स्वरुप में आकर देना यानि मानसिक स्तर का शारीरिक रूप से जुडाव होना... नाटक यानि विचार , विचार यानि खोज , खोज मतलब नयापन और हर पल नयापन मतलब बचपन !! इस बाल्यकाल की अवस्था में इन सहभागियों ने खुद को रूढ़ि वादी संस्कारों में कैद करने के बजाये , कलात्मक रूप से स्वयं को उन्मुक्त किया !!
हम समानता को मानते हैं , लेकिन क्या इस तत्व को अपने जीवन में कभी जीते हैं ? क्या इस तत्त्व की गहराई को कभी समझा है ? थिएटर ऑफ़ रेलेवंस की बालनाट्य कार्यशाला ने इस तत्व के अर्थ को स्पष्ट किया , बच्चों के व्यवहार से यह समझ आया की घर , परिवार और समाज में इन्हें अलग अलग नजरिये से देखा , समझा और अनुभूत किया जाता है जैसे लड़के को खुलापन लेकिन लड़की के हर कृति , व्यवहार पर नजर रखना ! अपनी जगह निर्माण न करने देना , आवाज़ , भावना , इच्छाएं इन सभी अभिव्यक्ति के माध्यमों पर नियंत्रण रखना ! ऐसे में थिएटर ऑफ़ रेलेवंस का तत्व - " मनुष्य को मनुष्य बने रखने की प्रक्रिया " खुद को अभिव्यक्त होने के लिए हौंसला बढाती है ! नाटक की प्रस्तुति से सहभागियों में यह विश्वास जगा की " में हूँ ... यह जगह मेरी है , यह जीवन मेरा है.. हम हैं "..
डर.. हिम्मत में परावर्तित हुआ , फुसफुसाहट .. बुलंद आवाज़ में बदल गयी , छुपे चेहरे ... खिलने और हसने लगे ... और उन्मुक्त दृष्टी से उन्मुक्त जीवन की सृजना होने लगी... इस कार्यशाला की यह विशेषता रही की हम खुद को इंसान मानने , समझने और अनुभव करने लगे !
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस अभ्यासक एवं रंगकर्मी
कोमल खामकर
komalkhamkar08@gmail.com





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